. भौगोलिक पृष्ठभूमि
बौंगाणी बाशा औज़ि समुदाय खासकर उत्तराखड रै उत्तरकाशी जिले दी पौड़ै खासकर आराकोट, टिकोची चीवाँ, औज़ि इऊँ रै आसपास रै गाउँ। हिमालय री ज़ागा, नौइयै, (टौंस, यमुना री सहायक नौइयै) औज़ि पहाड़ी रहन सहन कौइ बंगाण दी एक नौ आकार मिलौन्दौ।
पुरै इलाके दि जनसंख्या लगबग 50 कौइ 60 हज़ार रै बीच़े दि, एसदि लगबग छ़ोटै बौड़ै 45 कौइ 55 गाँव। शुरुवाती दि छ़ेउड़िउँ रि शिक्षा क्वाँसउँ कौइ कम थी पर ऐबै एउँ फर्क काफि कम औइ गोअ, लगबग बराबर औइगो।
2. नाउँ रि उत्पत्ति
“बौंगाणी ” नाम के बारे में लोगु रै अलग-अलग बिच़ार —
- कुछ़ लोग बौंगाण ईलाकेई क्षेत्रिय पचान कौई ज़ोड़ैण।
- कुछ़ बिद्वान एस ज़मानौउँ री बसावट, या बंगाल रि ओर कौइ आयैन्दै लोग बोलैण, (पर सारै लोग एशौ ना मानदै, एसरी सौचाइ री पुष्टि ना नौथी।
- वाकेई येउ नाउँ बौक्त रै साथै बाशा औज़ि समुदाय दुईंयाउँ री पैचान बौणिगो।
शुरुवाति दि बौंगाणि समाज़ खेती औज़ि पशुपालन दि निर्बर थौ, पर ऐबै एत्कै ज़ादातर सेब रि खेती औयै।
एत्कै खेती औळै कौइ औयै, सारै लोग एक दुजे री कामैं कौरने खि साइता कौरैण ज़ेसखी बौगाणी बोली दि बुवारै बोलैण, फैसलौ निणै खी ईबी बी एत्कै लोक पंचायत च़ौलै।
एत्कै रै लोकदेवता, तौइ तिवार (जैशौ बूढ़ा केदार, स्थानीय जात्रा) रौ सामाजिक ज़िन्दगी दि खास ज़ागा।)
4. बाशा रौ ऐतिहासिक विकास
- बौंगाणी एक पहाड़ी समुह री बोली।
- ईंदी संस्कृत, प्राकृत, अपब्रंश रै साथै पड़ोसी बाशा (गढ़वाली, जौनसारी, हिन्दी) रौ परबाव दिशै।
- काफि बौक्तै ज़ौउँ ऐ बाशा मौखिक रूप दी थी, काऽणी, गीत, कहावत, औज़ि लोककथा रै ज़ौरियै कौई लोग बोलच़ाल कौरैण थै।
5. साहित्य और लोकपरंपरा
- बँगाणी बोली दि लोकगीत, काणियै, शादि रै गीत, रितु गीत, सारै शामिल।
- लिखित साहित्य थोड़ौ मेसै बिकसित उवौ, पर ऐबै बँगाण दि लोग खूब रौयै बाशा दि लिखदै औज़ि बोल्दै लागौन्दै, इस कौइ लिखत रूप दि बी बाशा रौ बिकास औन्दै लागौन्दौ।
- बँगाण रै रीति रूवाज़ु दी कुछ़ खास परकार रै गाणैं बी गायैण, ज़िउँ खि छ़ोड़ै, औज़ि लामैंण, मौलकु बी बोलैण, लामैण रौ एक उदाहरण- नींदुड़ि बोलै थी सुती रौंउँ थौ....। च़ितमोळा... सुतने.... ना देंदि.......
6. औपनिवेशिक काल औज़ि तेत्बासियै रौ बौक्त
- ब्रिटिश काल दि प्रशासनिक ढाँचे दि औज़ि शिक्षा दि असर उवौ, ज़ेसकौइ हिन्दी भाषा रौ प्रच़ार बौड़ौ।
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तेत्बासिऐ बँगाणी बोली सार्वजनिक प्रयोग कम उवौ, पर गाँव गढ़ दी ऐ बोली ज़िउँदि थी।
7. आधुनिक काल: संरक्षण औज़ि पुनर्जीवन
- ऐबै बँगाणी बोलियेई एक लुप्त औणै औळी बोली ज़ाणियौ, ईंरै बच़ाव खि काम औंदै रौ लागी।
- शिक्षा, गीत-बजन, धार्मिक किताबै रौ अनुवाद, डिजिटल मीडिया औज़ि वेबसाइटों के माध्यम कौइ बोली कै एक को नौई पैछ़ान रौइ मिल्दि लागी।
8. बंगाणी पहचान री खासियत
बँगाणी बोली खालि एक बोली नौथी, बल्कि
- इतिहास,
- विश्वदृष्टि,
- आस्था,
-
औज़ि सामुदायिक याद री अभिव्यक्ति।
ईं बोलिियै सुरक्षित थौणौं आपड़ै बाप दादाउँ री विरासत सुरक्षित थौणो औयै।